अभीरुवीराजीवन्तीजीवकर्षभकैः स्मृतम्।(ध.नि./मिश्रक/२५, अ.हृ.सू.६/६०, अ.सं.सू. १२/६०)
Wednesday, 7 April 2021
जीवनीय पंचमूल
मध्यम पंचमूल
बलापुनर्नवैरण्डशूर्पपर्णीद्वयेन तु।(अ.हृ.सूत्र. ६)
मध्यम पञ्चमूल के गुणकर्म ---
वल्ली पंचमूल
विदारीसारिवारजनीगुडूच्योऽजश्रृंगी चेति वल्लीसंज्ञः। (सु.सू. ३८/७३)
वल्ली पञ्चमूल के गुणकर्म ---
लघु पंचमूल
लघु पञ्चमूल के गुणकर्म ---
बृहत पंचमूल
पञ्चमूलं त्रिदोषघ्नं वातघ्नं लघुसंज्ञकम।
बृहतपंचमूल के गुणकर्म ----
Monday, 19 October 2020
पञ्चमहाभूत द्रव्यों के लक्षण
तत्र द्रव्याणि गुरुखरकठिनमन्दस्थिरविशदसान्द्रस्थूलगन्धगुणबहुलानि पार्थिवानि , तान्युपचयसङ्घातगौरवस्थैर्यकराणि;
पार्थिव द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्य (१) गुरु , (२) खर , (३) कठिन , (४) मन्द , (५) स्थिर , (६) विशद , (७) सान्द्र , (८) स्थूल तथा (९) गन्ध गुण प्रधान वाले द्रव्य पार्थिव द्रव्य होते हैं । इन पार्थिव द्रव्यों का यदि सेवन किया जाये तो शरीर में वृद्धि , संघात ( शरीर का ठोस होना), गुरुता और स्थिरता उत्पन्न होती है।
द्रवस्निग्धशीतमन्दमृदुपिच्छिलरसगुणबहुलान्याप्यानि, तान्युपक्लेदस्नेहबन्धविष्यन्दमार्दवप्रह्लादकराणि;
जलीय द्रव्य के लक्षण -जो द्रव्य में (१) द्रव , (२) स्निग्ध , (३) शीत , (४) मन्द , (५, मृदु , (६) पिच्छिल और (७) रस गुण प्रधान वाले द्रव्य जलीय द्रव्य होते हैं । इनके सेवन से ये शरीर में उपक्लेद ( गीलापन), स्नेह (स्निग्धता), बन्ध (सन्धिवन्धनों को समुचित रूप में रखना), विष्यन्द , मार्दव (शरीर में मृदुता उत्पन्न करना) और प्रहाद उत्पन्न करते हैं।
उष्णतीक्ष्णसूक्ष्मलघुरूक्षविशदरूपगुणबहुलान्याग्नेयानि, तानि दाहपाकप्रभाप्रकाशवर्णकराणि;
तैजस द्रव्य के लक्षण -जो द्रव्य में (१) उष्ण , (२) तीक्ष्ण , (३) सूक्ष्म , (४) लघु , (५) रूक्ष , (६) विशद और (७) रूप गुण प्रधान वाले द्रव्य तैजस द्रव्य होते हैं। ये तैजस द्रव्य सेवन करने पर शरीर में दाह, पाक, प्रभा, प्रकाश और शरीर में वर्ण (रूप ) को विकसित करते हैं ।
लघुशीतरूक्षखरविशदसूक्ष्मस्पर्शगुणबहुलानि वायव्यानि, तानि रौक्ष्यग्लानिविचारवैशद्यलाघवकराणि;
वायव्य द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्यों में (१) लघु , (२) शीत , (३) रूक्ष , (४) खर , (५) विशद , (६) सूक्ष्म और (७) स्पर्श गुण प्रधान वाले होते है वे वायव्य द्रव्य कहे जाते हैं । ये वायव्य द्रव्य सेवन करने पर शरीर में रूक्षता, ग्लानि, विचार (गति ) विशदता और लघुता उत्पन्न करते हैं।
मृदुलघुसूक्ष्मश्लक्ष्णशब्दगुणबहुलान्याकाशात्मकानि, तानि मार्दवसौषिर्यलाघवकराणि||११|| (च.सू.अ.26)
आकाशीय द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्यों में (१) मृदु , (२) लघु , (३) सूक्ष्म (४) श्लक्ष्ण और (५) शब्द गुण प्रधान वाले होते है वे आकाशीय द्रव्य होते हैं। आकाशीय द्रव्य सेवन करने पर शरीर में कोमलता, सुषिरता और लघुता उत्पन्न करते हैं।
Monday, 12 October 2020
पाचन के द्वारा लंघनीय पुरुष
वम्यतीसारहृद्रोगविसूच्यलसकज्वराः||२०||
विबन्धगौरवोद्गारहृल्लासारोचकादयः|
पाचनैस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणादावुपाचरेत्||२१||(च.सू.अ.22)
पाचन के द्वारा लंघनीय पुरुष --- पाचन द्वारा लंघन उन व्यक्ति में करते हैं जिनको कफ , पित्त के द्वारा उत्पन्न रोग मध्यम बल वाला हो, छर्दि , अतिसार , हृदयरोग , विसूचिका , अलसक तथा ज्वर से पीड़ित मनुष्य हो और विबंध हो , शरीर में गुरुता हो , उद्गार अधिक आती हो, हल्लास ( जी मचलाना ) , अरोचक आदि से पीड़ित हो।
पंचकोल
पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः। पञ्चभिः कोलमात्रं यत्पञ्चकोलं तदुच्यते ॥(भा.प्र/हरीत./७२) पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः। सर्व...
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विदारीसारिवारजनीगुडूच्योऽजश्रृंगी चेति वल्लीसंज्ञः। (सु.सू. ३८/७३) निशामृता मेषश्रृंगी गोपवल्ली विदारिका। वल्याख्यं पंचमूलं ................
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पञ्चमूलं त्रिदोषघ्नं वातघ्नं लघुसंज्ञकम। ज्वरकासश्वासशूलमन्दाग्न्यरुचिनाशम्॥(ध.नि./मिश्रक/२२) बिल्वाग्निमन्थटिण्टुकपाटला: काश्मर्यश्चेति ...
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तत्र द्रव्याणि गुरुखरकठिनमन्दस्थिरविशदसान्द्रस्थूलगन्धगुणबहुलानि पार्थिवानि , तान्युपचयसङ्घातगौरवस्थैर्यकराणि; पार्थिव द्रव्य के लक्षण - ज...


