Wednesday, 7 April 2021

जीवनीय पंचमूल

 अभीरुवीराजीवन्तीजीवकर्षभकैः स्मृतम्।(ध.नि./मिश्रक/२५, अ.हृ.सू.६/६०, अ.सं.सू. १२/६०) 

शाकश्रेष्ठाऽभीरुपत्रीवीराजीवकर्षभकैः।(कै.नि./औषध/७६)

व्याख्या --- शतावरी , काकोली , जीवन्ती , जीवक और ऋषभक इन पांचो की मूल जीवनीय पञ्चमूल कहलाती हैं। 

जीवनीय पञ्चमूल के गुणकर्म --- 


जीवनाख्यं च चक्षुष्यं वृष्यं पित्तानिलापहम् ॥(ध.नि. ७/२५, अ.हृ.सू. ६/६०) 

व्याख्या ---
★ चक्षुष्य अर्थात नेत्र के लिए हितकारी होता हैं। 
★ वृष्य व पित्त-वात का नाश करता हैं। 

जीवनाख्यं पंचमूलं वृष्यं पित्तानिलापहम्।
चक्षुष्यं बृहणं बल्यं दाहतृष्णाज्वरप्रणुत्॥ (कै.नि/औषधि/७७) 

व्याख्या ---- 
★ वृष्य व पित्त-वात का नाश करता हैं।
★ चक्षुष्य , बृंहण , बल्य , दाह , तृष्णा और ज्वर का नाश करता हैं। 


मध्यम पंचमूल

 बलापुनर्नवैरण्डशूर्पपर्णीद्वयेन तु।(अ.हृ.सूत्र. ६)

बलापुनर्नवैरण्डशूर्पपर्णीद्वयेन च।(ध.नि./मिश्रक/२०) 

बलापुनर्नवैरण्डसूर्यपर्णीद्वयेन च। 
एकत्र योजितेनैतन्मध्यमं पञ्चमूलकम् ॥ (रा.नि./मिश्रक/२९) 

माषपर्णीमुद्गपर्णीबलैरण्डपुनर्नवैः। 
मध्यमाख्यं पंचमूलं कफवातहरं परम्॥(कै.नि.औ./७५) 

मुद्गपर्णीमाषपर्णीबलैरण्डपुनर्नवैः।
मध्यमाख्यं ..........................॥ (कै.नि./मिश्रक/४)

व्याख्या -- बला , पुनर्नवा , एरण्ड , शालपर्णी व पृश्निपर्णी , इन पांचो की मूल मध्यम पञ्चमूल कहलाती हैं। 

मध्यम पञ्चमूल के गुणकर्म ---


मध्यमं कफवातघ्नं नातिपित्तकरं स्मृतम्।(अ.हृ.सूत्र. ६/७०) 

मध्यमं कफवातघ्नं नातिपित्तकरं सरम्।(ध.नि. ७/२०)
व्याख्या ---
★ यह कफ-वात का नाश करता हैं। लेकिन पित्त को नहीं बढ़ाता हैं। 


वल्ली पंचमूल


 विदारीसारिवारजनीगुडूच्योऽजश्रृंगी चेति वल्लीसंज्ञः। (सु.सू. ३८/७३)


निशामृता मेषश्रृंगी गोपवल्ली विदारिका। 
वल्याख्यं पंचमूलं ......................(कै.नि. मिश्रक/५) 

अजश्रृंगी हरिद्रा च विदारी सारिवाऽमृता। 
वल्ल्याख्यं ........................॥(अ.सं. १२४६१-६२)

व्याख्या --- विदारी , सारिवा , हरिद्रा , गुडूची और अजश्रृंगी इन पंचो की मूल वल्ली पञ्चमूल कहलाती हैं। 
विमर्श -- यहाँ पर रजनी से मंजिष्ठा लेना उचित हैं। 

वल्ली पञ्चमूल के गुणकर्म ---


रक्तपित्तहरौ ह्येतौ शोफत्रयविनाशनौ । 
सर्वमेहहरौ चैव शुक्रदोषविनाशनौ ।। (सु.सु. ३८/७६) 

व्याख्या --- 
★ कण्टक पञ्चमूल व वल्ली पंचमूल रक्तपित्त का शमन करते हैं। तीनों प्रकार के शोथ , सभी प्रकार के प्रमेह और शुक्र दोष का नाश करते हैं। 

सर्वदोषहरे च ते।(अ.सं. १२/६२) 

व्याख्या --- कण्टक पञ्चमूल व वल्ली पञ्चमूल सभी प्रकार के दोषो का नाश करती हैं। 


लघु पंचमूल


तत्र त्रिकण्टकबृहतीद्वयपृथक्पण् र्यो विदारीगन्धा चेति कनीयः ।(सु.सू. ३८/६७)

शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका।
तथा गोक्षुरकश्चैव पञ्चमूलं लघु स्मृतम्। (ध.नि.मिश्रक/२१)

शालपर्णी पृश्निपर्णी वार्ताकी कण्टकारिका। 
गोक्षुरः पञ्चभिश्चैतैः कनिष्ठं पञ्चमूलकम् ॥ (भा.प्र./गुडू./४७) 

ह्रस्वं बृहत्यंशुमतीद्वयगोक्षुरकैः स्मृतम् ।(अ.सं.सू./६०) 

ह्रस्वं बृहत्यंशुमतीद्वयगोक्षुरकैः स्मृतम्।(कै.नि./औषध/७२) 

शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका। 
तथा गोक्षुरकश्चेति लध्विदं पञ्चमूलम्॥ (राजनिघण्टु मिश्रक/२६) 

एरण्डबृहतीद्वयं पृथक्पर्णी सालपर्णी विदारीगन्धादौ। (सौश्रुत निघण्टु)

व्याख्या--- शालपर्णी , पृश्निपर्णी , बृहती , कण्ठ्कारी और गोक्षुर इन पांचो की मूल का मिश्रण लघु पञ्चमूल कहलाता हैं। 

लघु पञ्चमूल के गुणकर्म --- 


कषायतिक्तमधुरं कनीय: पञ्चमूलकम् । 
वातघ्नं पित्तशमनं बृंहणं बलवर्धनम् ॥(सु.सु. ३८/६७) 

व्याख्या --- 
★ लघु पञ्चमूल कषाय , तिक्त व मधुर रस प्रधान होता हैं। 
★ वात-पित्त का नाश करने वाला होता हैं। 
★ बृंहण और बल बढ़ाने वाला होता हैं। 

पञ्चमूलं लघु स्वादु बल्यं पित्तानिलापहम्। 
नात्युष्णं बृहणं ग्राहि ज्वरश्वासाश्मरीप्रणुतम्॥ (भा.प्र./गुडू./४८) 

व्याख्या --- 
★ गुण में लघु , मधुर रस , पित्त-वात का नाश करने वाला होते हैं। 
★ कुछ उष्ण , बृंहण , ग्राही , ज्वर और श्वास नाशक होता हैं। 

स्वादुपाकरसं नातिशीतोष्णं सर्वदोषजित् ॥ (कै.नि./औषध/७३) 

व्याख्या --- 
★ रस व विपाक में मधुर होता हैं। 
★ वीर्य में अनुष्ण तथा त्रिदोष का नाश करने वाला होता हैं। 

ह्रस्वाख्यं पञ्चमूलं स्यात्पञ्चभिर्गोखुरादिभिः। 
बल्यं पित्तानिलहरं नात्युष्ण स्वादु बृंहणम् ॥(म.पा.नि./हरी/७१)

व्याख्या ---- 
★ बल्य , पित्त वात का नाश करने वाला होता हैं। 
★ वीर्य में अनुष्ण तथा मधुर रस होता हैं।
★ बृंहण करने वाला होता हैं। 


बृहत पंचमूल


 पञ्चमूलं त्रिदोषघ्नं वातघ्नं लघुसंज्ञकम। 

ज्वरकासश्वासशूलमन्दाग्न्यरुचिनाशम्॥(ध.नि./मिश्रक/२२)

बिल्वाग्निमन्थटिण्टुकपाटला: काश्मर्यश्चेति महत्।(सु.सू.) 

श्रीफलः सर्वतोभद्रा पाटला गणिकारिका।
स्योनाक:पञ्चभिश्चैतैः पञ्चमूलं महन्मतम्॥ (महौ.नि./सं. वर्ग/१८)
 
श्रीफल: सर्वतोभद्रा पाटला गणिकारिका।
श्योनाक: पञ्चभिश्चैतेः पञ्चमूलं महन्मतम् ॥ (भा.प्र./गुडू./२९) 

बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाक: काश्मर्यः पाटला तथा। 
सर्वेस्तु मिलितैरेतैः स्यान्महापञ्चमूलकम्॥(रा.नि. मिश्रक/२७) 

बिल्वकाश्मर्यतर्कारिपाटलाटिण्टुकैर्मतम् ।(कै.नि. औषध/७१)

बिल्वोऽग्निमंन्थः श्योनाक: काश्मर्यः पाटला तथा।
ज्ञेयं महापञ्चमूलं .......... ... . .॥ (ध.नि./मिश्रक/१७) 

व्याख्या -- बिल्व , अग्निमन्थ , श्योनाक , पाटला और गम्भारी इन पांचो की मूल बृहतपंचमूल कहलाती हैं। 

बृहतपंचमूल के गुणकर्म ---- 


तिक्तं कफवातघ्नं पाके लध्वग्निदीपनम् । 
मधुरानुरसं चैव पञ्चमूलं महन्मतम् ॥ (सुश्रुत)

व्याख्या --- 
★ तिक्त रस युक्त तथा कफवात शामक होता हैं। 
★ विपाक में लघु व दीपन करने वाला होता हैं। तथा अनुरस में मधुर होता हैं। 

पञ्चमूलं महत् तिक्तं कषायं कफवातनुत् । 
मधुरं श्वासकासघ्नमुष्णं लघ्वग्निदीपनम् ॥(भा.प्र./गुडू./३०) 

पञ्चमूलं कषायोष्णं सतिक्तं कफवातजित् । 
मधुरानुरसं तिक्तं पाके लध्वग्निदीपनम्॥ (कै.नि./औषध/७१-७२) 

व्याख्या --- 
★ तिक्त व कषाय रस युक्त होता हैं। 
★ कफ व वात का नाश करता हैं। 
★ उष्ण वीर्य वाला होता हैं। 
★ लघु व श्वास का नाश करने वाला तथा दीपन करने वाला होता हैं। 

बिल्वादिभिः पञ्चभिरेतत्स्यात्पञ्चमूलं महदग्निकारि।
लघूष्णतिक्तं रसतः कषायं मेदःकफश्वाससमीरहारि॥ (म.पा.नि./हरी./५७) 

व्याख्या --- 
★ अग्नि को बढ़ाने वाला होता हैं।  
★ लघु , उष्ण तथा तिक्त व कषाय रस वाला होता हैं। 
★ मेद , कफ , श्वास व वायु का शमन करने वाला होता हैं। 

जयेत्कषायं तिक्तोष्णं पंचमूलं कफानिलौ ।(अ.स.सू. १२/५७) 

व्याख्या -- 
★ तिक्त उष्ण व कफ वात का नाश करने वाला होता हैं। 


Monday, 19 October 2020

पञ्चमहाभूत द्रव्यों के लक्षण

तत्र द्रव्याणि गुरुखरकठिनमन्दस्थिरविशदसान्द्रस्थूलगन्धगुणबहुलानि पार्थिवानि , तान्युपचयसङ्घातगौरवस्थैर्यकराणि; 


पार्थिव द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्य (१) गुरु , (२) खर , (३) कठिन , (४) मन्द , (५) स्थिर , (६) विशद , (७) सान्द्र , (८) स्थूल तथा (९) गन्ध गुण प्रधान वाले द्रव्य पार्थिव द्रव्य होते हैं । इन पार्थिव द्रव्यों का यदि सेवन किया जाये तो शरीर में  वृद्धि , संघात ( शरीर का ठोस होना), गुरुता और स्थिरता उत्पन्न होती है। 


द्रवस्निग्धशीतमन्दमृदुपिच्छिलरसगुणबहुलान्याप्यानि, तान्युपक्लेदस्नेहबन्धविष्यन्दमार्दवप्रह्लादकराणि;


जलीय द्रव्य के लक्षण -जो द्रव्य में (१) द्रव , (२) स्निग्ध , (३) शीत , (४) मन्द , (५, मृदु , (६) पिच्छिल और (७) रस गुण प्रधान वाले द्रव्य जलीय द्रव्य होते हैं । इनके सेवन से ये शरीर में उपक्लेद ( गीलापन), स्नेह (स्निग्धता), बन्ध (सन्धिवन्धनों को समुचित रूप में रखना), विष्यन्द , मार्दव (शरीर में मृदुता उत्पन्न करना) और प्रहाद उत्पन्न करते हैं। 


उष्णतीक्ष्णसूक्ष्मलघुरूक्षविशदरूपगुणबहुलान्याग्नेयानि, तानि दाहपाकप्रभाप्रकाशवर्णकराणि;


तैजस द्रव्य के लक्षण -जो द्रव्य में (१) उष्ण , (२) तीक्ष्ण , (३) सूक्ष्म , (४) लघु , (५) रूक्ष , (६) विशद और (७) रूप गुण प्रधान वाले द्रव्य तैजस द्रव्य होते हैं। ये तैजस द्रव्य सेवन करने पर शरीर में दाह, पाक, प्रभा, प्रकाश और शरीर में वर्ण (रूप ) को विकसित करते हैं । 


लघुशीतरूक्षखरविशदसूक्ष्मस्पर्शगुणबहुलानि वायव्यानि, तानि रौक्ष्यग्लानिविचारवैशद्यलाघवकराणि;


वायव्य द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्यों में (१) लघु , (२) शीत , (३) रूक्ष , (४) खर , (५) विशद , (६) सूक्ष्म और (७) स्पर्श गुण प्रधान वाले होते है वे वायव्य द्रव्य कहे जाते हैं । ये वायव्य द्रव्य सेवन करने पर शरीर में रूक्षता, ग्लानि, विचार (गति ) विशदता और लघुता उत्पन्न करते हैं। 


मृदुलघुसूक्ष्मश्लक्ष्णशब्दगुणबहुलान्याकाशात्मकानि, तानि मार्दवसौषिर्यलाघवकराणि||११|| (च.सू.अ.26)


आकाशीय द्रव्य के लक्षण - जो द्रव्यों में (१) मृदु , (२) लघु , (३) सूक्ष्म (४) श्लक्ष्ण और (५) शब्द गुण  प्रधान वाले होते है वे आकाशीय द्रव्य होते हैं। आकाशीय द्रव्य सेवन करने पर शरीर में कोमलता, सुषिरता और लघुता उत्पन्न करते हैं।

Monday, 12 October 2020

पाचन के द्वारा लंघनीय पुरुष

येषां मध्यबला रोगाः कफपित्तसमुत्थिताः|
वम्यतीसारहृद्रोगविसूच्यलसकज्वराः||२०||
विबन्धगौरवोद्गारहृल्लासारोचकादयः|
पाचनैस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणादावुपाचरेत्||२१||(च.सू.अ.22)

पाचन के द्वारा लंघनीय पुरुष --- पाचन द्वारा लंघन उन व्यक्ति में  करते हैं जिनको कफ , पित्त के द्वारा  उत्पन्न रोग मध्यम बल वाला हो, छर्दि , अतिसार , हृदयरोग , विसूचिका , अलसक तथा ज्वर से पीड़ित मनुष्य हो और विबंध हो , शरीर में गुरुता हो , उद्गार अधिक आती हो, हल्लास ( जी मचलाना ) , अरोचक आदि से पीड़ित हो।

पंचकोल

  पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः।  पञ्चभिः कोलमात्रं यत्पञ्चकोलं तदुच्यते ॥(भा.प्र/हरीत./७२)   पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः। सर्व...